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हमारे बारे में .........

सृष्टि के निर्माण में हमारे धर्म शास्त्र में पंच तत्व पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि और आकाश को महत्व दिया गया है। इसमें जल शब्द को प्राणी जीवन, प्रकृति अर्थात् समस्त सृष्टि के लिए अतिआवश्यक तत्व के रूप में स्थान दिया गया है। अनादी काल से जल शब्द को समाज में एक देवता के रूप में महत्व दिया जाता है और हमारी संस्कृति में नदियों को मां के स्वरूप में पूजा जाता है। अर्थात् नदियां पालन पोषण करने वाली व्यवस्था का ही एक हिस्सा है,

इसलिए प्रत्यक्ष रूप में वृक्ष, कृषि, जीव जन्तु, मानव इन सब प्रकृति द्वारा बनी व्यवस्थाओं में जल का प्रतिशत इनके जीवन के लिए उपयोगी है। देश में जो पोराणिक कथाओं में प्रचलित है चाहे वह हमारी पवित्र मां गंगा के बारे में हो अथवा नर्मदा, क्षिप्रा, सरस्वती, सिन्धू, कावेरी आदि पोराणिक कथाओं के कारण ही इन सब के प्रति समाज की आस्था भगवान तुल्य है।

गंगा सप्तमी सन् 2004 को महा कुम्भ धर्म सभा का आयोजन किया गया था पूज्य सद्गुरूदेव आचार्य महामण्डेश्वर जूनापीठाधिश्वर डाॅ. स्वामी अवधेशानंद गिरी जी महाराज की संकल्पना पर समस्त पंथों के संतों के साथ नव संवाद, नव विचार, नव संकल्प जल संस्कृति परिषद के साथ क्षिप्रा नदी संरक्षण एवं घाटी विकास के प्रति सरोवर विद, पर्यावरण विद, जल विद, जल अभियंता एवं संस्कृति विदों ने विराट जल धर्म सभा के समक्ष दृष्टिपत्र एवं क्षिप्रा जल घोषणा के रूप में प्रमुख प्रस्ताव रखे थे, इस खुले सत्र की अध्यक्षता स्वयं स्वामी अवधेशानंद गिरी जी एवं प्रस्तावक श्री राजेन्द्रसिंह जल चिंतक थे, जिनकी उपस्थिति में 10,000/- धर्मसभा के प्रतिनिधियों ने हाथ उठाकर इन प्रस्तावों का अनुमोदन दिया था। प्रस्ताव यह था कि उद्गम से बहे क्षिप्रा, क्षिप्रा उद्गम के जल से हो श्रद्धालुओं के स्नान, क्षिप्रा नदी सदा निरा रहे। इसी उद्देश्य की प्राप्ति के लिए हमने क्षिप्रा उद्गम क्षेत्र में कार्य प्रारंभ किया और संस्था श्री सद्गुरू ग्रामीण विकास एवं अनुसंधान परिषद का गठन किया गया। विगत वर्षो से इसी क्षेत्र में अनावरत नदी एवं नदी के समुदाय हेतु सेवा कार्य चल रहे है।